आलोचना का पारंपरिक रूप में अर्थ दोष दर्शन मिलता है | जो साहित्यिक कृति के गुण-दोष निरूपण तक ही सिमित था | आज आलोचना एक मुख्य विधा के रूप में प्रतिष्ठित होने के बाद आलोचना एवं आलोचक का दायित्व बढ़ जाता है | ‘आलोचना’ शब्द संस्कृत की ‘लुच् दर्शन’ धातु से बना हुआ है | संस्कृत व्याकरण के अनुरूप ‘आ’ उपसर्ग का अर्थ ग्रहण होता है-सम्यक् रूप देखना या देखना | इस प्रकार आलोचना का अर्थ किसी वस्तु को उसकी समग्रता में देखना एवं गुण-दोष का विवेचन, परख और समीक्षा कर सकते है | हिन्दी साहित्य में विधा विशेष के रूप में उस पर अंग्रेजी के ‘क्रिटिसिज्म’ शब्द की निष्पति ग्रीक शब्द ‘क्रिटिकोस’ से स्वीकारी जाती है | जिसका अर्थ विवेचना करना अथवा निर्णय देना होता है | ग्रीक और संस्कृत शब्दों के अर्थ में सामान्य अन्तर के साथ एक्य दिखाई पड़ता है | अत: एक सफल समीक्षा के लिए एक आलोचक में निम्नलिखित गुण अनिवार्यता होती है एवं सूचित दोष से भी बचाना जरुरी होता है |
आलोचक के प्रमुख गुण
आलोचक साहित्य का गहन अध्यायता एवं ज्ञाता होना चाहिए ।
आलोचक के पास विस्तृत अध्ययन अनुभव, मनन एवं चिंतनशील व्यक्तित्व की अनिवार्यता होती है।
आलोचक की साहित्य प्रतिभा प्राकृतिक एवं अर्जित काव्य प्रतिभा से युक्त हो।
आलोचक का हृदय सहृदयता एवं उदारता से भरा हो ।
आलोचक में वस्तुनिष्ठता, तटस्थता, निष्पक्षता एवं पूर्वाग्रह से मुक्त रहने का गुण विद्यमान हो ।
एक आलोचक के पास सूक्ष्म अंत:दृष्टि से संपन्न दृष्टिकोण की अनिवार्यता होती है ।
आलोचक के हृदय में सहानुभूति एवं स्वानुभूति के गुण हो ।
आलोचक मनोवैज्ञानिक ज्ञान का ज्ञाता होना चाहिए ।
आलोचक के पास अनुसंधानात्मक और गवेश्नात्मक दृष्टि हो।
आलोचक स्वयं में निर्णात्मक क्षमता विद्यमान होनी चाहिए ।
भाषा, शब्द एवं अर्थ की परख करने सामर्थता होना चाहिए ।
आलोचक के पास साहित्य सौंदर्य को समझने की अंतर्दृष्टि विद्यमान होनी चाहिए ।
आलोचना करते हुए आलोचक को निम्नलिखित दोष से प्रयत्नपूर्वक बचना चाहिए ।
संकीर्ण दृष्टिकोण
व्यक्तिगत राग-द्वेष
पक्षपात और गुटबंदी
अभिमानी व्यक्तित्व
अपरिपक्व एवं अपूर्ण ज्ञान
अनुदारता और असहिष्णुता
पूर्वग्रह युक्त दृष्टि
अपूर्ण भाषा ज्ञान
अर्थ बोधन की अक्षमता
रूढ़ीगत मानसिकता
अतिशय भावुकता
चिंतन एवं मनन का अभाव
व्यक्तिगत ईर्ष्या
हठधर्मिता
तर्कहीन निष्कर्ष आदि
