कबीर भारतीय भक्ति परम्परा के ऐसे कवि हैं जिन्होंने सम्प्रदायों की जड़ता, बाह्याचार और पाखण्ड पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने धर्म के नाम पर मनुष्य द्वारा मनुष्य के साथ किए जा रहे भेदभाव को अस्वीकार किया। उनकी कविता किसी एक सम्प्रदाय की नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा की आवाज़ है। ‘सम्प्रदाय’ शब्द धर्म या विश्वास की एक निश्चित पद्धति को दर्शाता है। किन्तु जब यह पद्धति संकीर्णता और अंधविश्वास का रूप ले लेती है, तो वह एक कटघरा बन जाती है—जहाँ विचार, स्वतंत्रता और सच्ची आध्यात्मिकता को बाँध दिया जाता है। कबीर के समय में हिन्दू-मुस्लिम दोनों सम्प्रदायों में कर्मकाण्ड, बाह्याचार और एक-दूसरे के प्रति घृणा का वातावरण था। कबीर ने इसी पर चोट की। कबीर ने किसी धर्म या सम्प्रदाय को नकारा नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपे सत्य के सार को खोजने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा—
“मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।”
यह पंक्ति बताती है कि कबीर बाह्य देवालय-मस्जिद में नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर के ईश्वर की बात करते हैं।
कबीर का आविर्भाव ऐसे समय में हुआ था जब सम्पूर्ण राष्ट्र राजनैतिक, धार्मिक एंव सामाजिक दृष्टि से पतानोत्मुक हो रहा था । जब हमे इतिहास पर दृष्टि डालते है तो यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि कबीर काव्य में समसामयिक समस्याओं का यथार्थ चित्रण है और वर्तमान परिवेश में भी प्रासंगिक लगता है। उनके साहित्य का सृजन एक ऐसी विषय परिस्थिति में हुआ था | जब भारत में मुस्लिम शासन अपनी जडे जमा चुका था । इस्लाम धर्म का प्रचार शासन के आश्रम में तलवार के बल पर हो रहा था। दूसरी ओर दक्षिण भारत के अलबार भकित सम्पदाय की क्रांति को रामानंद ने उत्तर भारत में पहुंचाया | जिसमें ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं था एवं भक्ति के इस क्षेत्र में सब बराबर थे। ऐसी ही परिस्थिति में कबीर न रामानंद की शिष्यता ग्रहण कर भक्ति मार्ग की नई मान्यता को प्रतिष्ठित किया । कबीर के समय में देश के विभिन्न क्षेत्रो में एक सर्व सामान्य नियामक तत्व धर्म ही लक्षित होता है। सब अपने-अपने संप्रयादायो में बद्ध थे। किसी को देश की स्वतंत्रता और अखंडता की रीक्षा की चिंता न थी। ऐसे समय कबीर में धार्मिक संघर्ष और संकिर्णता से उपर उठ कर नए पंथ का संकेत किया। उस समय देश की एक प्रौढ प्रवर्तक और कर्मठ संचालक की आवश्यकता थी | जो जनता का सर्व धर्म सार स्वरूप एक स्थायी सार्वभौम मार्ग का निर्देश कर सके। कबीर में वह आग जल उठी। उसके स्वर में युगांतकारी क्रांति के लक्षण व्यकत हुए। युग जीवन ही उसकी प्रेरणा दिया और उससे चेतावनी का स्वर फुट पड़ा। 'कबीर का आविर्भाव जैसे इन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक परिस्थितियों का एक पूर्वग्रह पूर्वक आमंत्रण था और कबीर ने धर्म और समाज के संघटन के लिए समस्त बाह्याचारों का अन्त करने और प्रेम से समान धरातल पर रहने का एक सर्वसामान्य सिद्धांत प्रपिपादित किया' | कबीर का सार्वभौमिक संदेश यह है कि कबीर किसी सम्प्रदाय के कवि नहीं, मानवता के कवि हैं। उनका ‘राम’ न तो दशरथ का पुत्र है, न कोई धार्मिक प्रतीक-वह तो “सत्य, प्रेम और अंतःकरण की निर्मलता” का प्रतीक है।
"साई इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥"
भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन इसके साथ इसका विभाजन भी करना पड़ा | उस साल भी भीषण साम्प्रदायिक दंगा हुआ था। यहाँ ध्यान देने की बात है कि साम्प्रदाविकता के परिणामस्वरूप ही भारत टुकड़ों में विभाजित हुआ। अलगाववाद और विघटन के तत्व तब से बढ़ते ही चले गए | आज तो इन तत्वों के भीषण रूप के कारण समूचे देश की स्थित्ति विस्फोटक हो रही है। उग्रवाद तथा आतंकवाद का सर्वत्र खोफ है। राजनीति दूरदर्शिता के कारण आरक्षण नीति ने संपूर्ण भारतीय समाज को गृह युद्ध की स्थिति में ला दिया है, समूचा देश तोड-फोड़, संघर्ष, अग्निकांड और लूट-मार की घटनाओं से त्रस्त है। हर वर्ष देश के कुछ भागों में साम्प्रदायिक दंगे भड़क ही जाते है।
आजादी के तुरन्त बाद की स्थिति इतनी विस्फोटक नही थी | आज राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद की रामस्या को लेकर साम्प्रदायिक विस्फोट की स्थिति आ गई है। आजादी के बाद सरदार बल्लभभाई पटेल ने सर्व सम्मति से गुजरात के प्रसिध्ध सोमनाथ मंदिर का पुननिर्माण किया जिस वर्ष सोमनाथ मंदिर का निर्माण हुआ, उसी वर्ष अयोध्या मंदिर के पननिर्माण की भी शपथ ली गई | यह काम शान्तिपूर्वक पुरा नहीं हुआ, कयोंकि साम्प्रदायिकता की का तरंग १९४७ से ही उसका दायरा बढ़ता गया | कबीर की कविता समाज और धर्म की सड़ी-गली परंपराओं के खिलाफ क्रांति का स्वर है। उनकी रचनाओं में निर्भीक आलोचना, व्यंग्य और सत्य की खोज मिलती है। उदाहरण के लिए —
"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥"
यह पंक्तियाँ सामाजिक और धार्मिक पहचान से परे जाकर मानवता और ज्ञान को प्रधान मानती हैं। जो स्थिति आज देश में सर्वाधिक चिन्तनीय है, वह है साम्प्रदायिक तनाव की । किंवदन्ती है कि सम्पदाय के नाम पर लोगो को आपस में खुब लड़ाया जाता है और इतना खून बहाया जाता है; जिसका हिसाब नही हो सकता । राजनीति में ईमानदारी और निष्ठा जैसी चीजे लुप्त हो रही है। राजनीति दल एवं नेता स्वयं जातिवाद या सम्पदायवाद के प्रतीक बन गए है। राजनीति एक पारिवारिक धन्धा बन चुका है। इस समस्या को परस्पर सद्भाव एवं शान्ति से हल किया जाना चाहिए । देश में हिन्दू और मुसलमान भाई-भाई की तरह रहते आए है। यह तो अंग्रेज शासको की साम्राज्यवादी नीति का परिणाम था कि देश का विभाजन हुआ। उनकी' कटु राजनीति के कारण ही देश में साम्प्रदायिक तनाव एवं संघर्ष की घटनाएं होती रही है । कबीर ने हिन्दू और मुसलमान दोनों के कर्मकाण्डों पर व्यंग्य किया—
“पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़।
ताते यह चक्की भली, पीस खाय संसार॥”
और मुसलमानों पर भी कहा—
“काँकर पाथर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय,
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय?”
इन पंक्तियों में उन्होंने दिखाया कि ईश्वर पत्थरों या स्थलों में नहीं, बल्कि भावना और आत्मज्ञान में बसता है। कबीर की वाणी ‘सहज साधना’ की वाणी है। वे न हिन्दू हैं, न मुसलमान | वे
सिर्फ मानव हैं। उन्होंने कहा—
“हमन है ईशु, हमन है मौला,
एक नूर ते सब जग उपजा।”
यह मानवीय एकता की उद्घोषणा है, जो सम्प्रदाय की सीमाओं को तोड़ती है। वर्तमान स्थिति भी कुछ इसी तरह की है। सतारूढ पक्ष और विपक्ष की कुटनीति के कारण, स्वार्थ बुद्धि के कारण आए दिन साम्प्रदायिक दंगे कारण बन जाते है। अतः इस कलुषित विचार को त्याग कर एक स्वच्छ राजनिती का शुभारंभ होना चाहिए । सभी धर्मों के प्रति आदर की भावना रखकर भारत के समस्त नागरिको को बन्धुत्व की भावना से सदभाव एवं सहयोग पूर्वक रहना चाहिए ।
“हिन्दु तुरूक की एक राह है, सतगुरू, इह बताई।
कहे कबीर सुनह हो संतो, राम न कहेक खुदाई।“
संत कबीर ने साम्प्रदायिकता का विरोध कडे शब्दों में किया है | कबीर दास से अधिक तीखें शब्दो में इस एकता का प्रतिपादन किसी ने नहीं कोया ।
“सोई हिन्दू सो मुसलमान,
जिनका रहे ईमान सो
ब्राहमण जो ब्रह्म गियाना,
काजी जो जाने रहमान ।“
कबीर ने ईमान पर बहुत जोर दिया है। ईमानदारी पूर्वक अपना कर्तव्य निभाने में ही अपनी भलाई है। धर्म प्रेम का पंथ है, फीर धृणा कैसी, द्वेष केसा, मिथ्याभिमान कैसा ? मनुष्य एक ओर तो ईश्वर की पूजा कर ओर दुसरी ओर मनुष्य का तिरस्कार करे, यह बात बनने लायक नहीं प्रेम के महत्व पर कबीर कहते है।
“पोथी पढि-पढि जग मुआ, पंडित भया न कोय |
ढाई अच्छर प्रेम का पढे सो पंडित होय ।“
यह बात निर्विवाद है कि किसी दिन हिन्दुओ और मुसलमानो में एकता हुई तो इसी रस्ते से ही हो सकती है-
“कहहि कबीर वे दुनों भुले, रानहि किन्ह न पायो।
वे खस्सी वे गया कटावे, वादहि जन्मे गंगोत जेते
और मरद उपासी, सो सब रूप तुम्हारा
कबीर अल्ह राम का, सो गुरू पीर हमारा”
इस प्रकार हम देखते है कि आधुनिक संदर्भ में कबीर काव्य की प्रासंगिकता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। जिन मुददो पर कबीरने फटकार बताई, उन्हीं की प्रधानता आज की स्थिति में भी है। पंद्रहवीं शताब्दी में जा साम्प्रदायिक स्थिति थी सामान्यतः वही आज भी है। अतः कबीर साहित्य उतना ही प्रासंगिक आज भी है; जितना वह अपने समय में था।
“हिन्दु कहे वह राम हमार, तुरूक कहे रहीमाना।
आपस में दोऊ लडि लडि मूए, मरम न कोऊ जाना।“
कबीर अपना बहम विचार और आत्म साधन सार अर्थात अपना दर्शन प्रस्तुत करते है।
“तुम्ह जानी गीत है यहु निज अहम विचार
केवल कहीं सम्जाहया आतम साधन सार रे।“
कबीर के काव्य में केवल भावभंगिमा, मनोयोग पूर्ण स्थापन कौशल, चिन्तन गुण, संगीत गुण व्यंजन शकित का कम महत्व नहीं है। जिसमे छन्दो और अलंकारों का 'सिर चालन है, भाषा की लुनाई और तदनुसार वर्ण्य विषय में भी प्रर्याप्त मसृणता है। उनकी काव्यकला की उत्कृष्टता के सम्बन्ध में प्रश्न चिन्ह लगाना कठिन है। कबीर ने प्रबन्ध काव्य की रचना नहीं की | उनका सारा काव्य मुक्तक शैली का है अर्थात् उनका प्रत्येक छन्द अथवा गीत अपने में ही स्वतंत्र तथा पूर्ण है। इन्होने साखी, शबद और रमैनी के रूप में कविता की है। उनका प्रमुख ग्रंथ 'बीजक' है। कबीर की भाषा खीचडी-सधुक्कड़ी के रूप में पहचानी जाती है | कबीर के काव्य का सबसे प्रबल पक्ष जो उन्हें संपूर्ण हिन्दी साहित्य में अनन्य असाधारण व्यकितत्व प्रदान करता है; उसका व्यंग्य पक्ष है। उनकी वाणी आज भी कहती है —
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।”
इक्कीसवी सदी की देहलीज पर खडा व्यकित आज पहले से भी अधिक अप्रसन्न और तनावग्रस्त है। वह बाहय परिस्थितियो से त्रस्त होने के साथ-साथ अपने आप से भी आतंकित है। कब, कैसी प्रतिकिया वह कर बैठे, इससे अनजान है ! कारण की सबने मुखौट लगा रखे है | स्पष्ट है कि साम्प्रादायिक सद्भाव के प्रचार और प्रसार से अधिक आवश्यकता आज भावात्मक संवेदना को जागृत करने की है | मावन-मानव, व्यकित-व्यकित के अंदर स्थित शाश्वत तत्व (शुद्ध आध्यात्मिक शकित पुंज) को उत्तेजित कर पारस्परिक बंधुत्व एवं सौहाई उत्पन्न करना है। निसंदेह यह कार्य राजनैतिक साधनो से अधिक साहित्यिक तत्वों से किया जा सकता है। कवि की वाणी और लेखनी का अधिक महत्व है। अतः कबीर जैसे आत्मिक शब्द साधक की साहित्य साधना का उचित प्रयोग एक सामयिक आवश्कयता है।
संदर्भ ग्रंथ:
(१) कबीर वाणी-डॉ. पारसनाथ तिवारी, राजकमल प्रकाशन-इलाहबाद, प्रर्वांसंशोधीत संस्करण २००९
(२) कबीर, निराला और मुकितबोध-र्डा. (श्रीमती) ललीता अरोड़ा, भारतीय ग्रंथ निकेतन, प्रकाशन वर्ष-२००८
(३) कबीर साहब-युगेश्वर, लोकभारती प्रकाशन, प्रथम संस्करण-१९९९
(४) कबीर जीवन और दर्शन-उर्वशी सूरती, लोकभारती प्रकाशन, नवीन द्वितीय संस्करण : २००४
(५) लौह पुरूष कबीर-श्रीमती सुशीला सिन्हा, संजय प्रकाशन, प्रथम संस्करण-२००१

